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अंतर्द्वंद Antradvand By Dr. Sachidanand Kaveeshvar

             अंतर्द्वंद सुबह के घने कोहरे में, दूर – बहुत दूर मेरी मंज़िल एक धुंधली परछाई  की तरह नज़र आ रही थी। छत पर चढकर देखा ​तो ​ एक ​रौशन ​इमारत नज़र आई लगा...